Sunday, 26 May 2019

राष्ट्रीय संग्रहालय का हिस्सा बनी पाषाण युद्ध की ढाल

चम्पावत जिले के देवीधुरा में होने वाले पौराणिक व एतिहासिक महत्व के बग्वाल मेले (पाषाण युद्ध) में प्रयोग होने वाली ढाल राष्ट्रीय धरोहर का हिस्सा बन गई है। देवीधुरा के प्रसिद्ध मां बाराही मंदिर में रक्षाबंधन के दिन होने वाले बग्वाल मेले में चार गांवों (स्थानीय भाषा में चार खाम) के लोग दो समूह में बंटकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। पत्थरों की बारिश से चोटिल होने से बचाने वाली ढाल (फर्रे) को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल में प्रदर्शित किया गया है। बाराही मंदिर में श्रावण शुक्ल एकादशी से कृष्ण जन्माष्टमी तक मेला आयोजित होता है। रक्षाबंधन यानी श्रावणी पूर्णिमा के दिन होने वाली 'बग्वाल' एक तरह का पाषाण युद्ध है। जिसको देखने देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी मेले को लेकर चली आ रही मान्यता बताते हुए कहते हैं कि बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती।


बांस व ङ्क्षरगाल से होती है तैयार

छतरी नुमा आकार के फर्रा को पतली-पतली बांस व ङ्क्षरगाल की डंडियों से तैयार किया जाता है। डंडियों को आपास में इतना कसकर जोड़ा जाता है ताकि वह तेज गति से आ रहे पत्थरों का वेग आसानी से सह सके। अंदर की तरफ फर्रे को पकडऩे के लिए हैंडिल बनाया जाता है, ताकि तेजी से आते पत्थरों को रोकते समय पकड़ मजबूत बनी रहे। 



डॉ. नयाल ने किया संकलन

मानव विज्ञान संग्रहालय भोपाल के अंतरंग भवन वीथि संकुल में प्रदर्शित ढाल का संकलन संग्रहालय के सहायक डॉ. आरएम नयाल ने किया। डॉ. नयाल ने बग्याल मेले व ढाल की बेसिक जानकारी देते दस्तावेज भी तैयार किए हैं।


बढ़ेगा प्रदेश का मान

मां बाराही मंदिर समिति देवीधुरा के अध्यक्ष खीम सिंह लमगडिय़ा कहते हैं बग्वाल मेला प्राचीन समय से चला आ रहा है। स्थानीय लोग आज भी उसी आस्था से बग्वाल की परंपरा निभाते हैं। बग्वाल में प्रयोग होने वाली ढाल को मानव विज्ञान संग्रहालय में प्रदर्शित करना लोक परंपरा को संरक्षित करने जैसा है। देश-विदेश के लोग मेले के बारे में जान पाएंगे।

Saturday, 13 April 2019

बुजुर्ग मां का देसी नुस्खा बना हर्बल प्रोडक्ट, मॉल पर बिक रहा

गणेश पांडे : दृढ़ इच्छाशक्ति व विजन हो तो नए रास्ते निकल आते हैं। बुजुर्ग मां के देसी नुस्खे को रोजगार का माध्यम बनाकर तारा दत्त जोशी ने इस सूत्र को सही साबित किया है। हर्बल उत्पादों से तैयार कुमकुम व रोली (पिठ्या) को बाजार में हाथों-हाथ लिया जा रहा है।

पुराने समय में जब बाजार सीमित था और गिने चुने लोगों की ही बाजार तक पहुंच थी। ऐसे में कई जरूरी चीज घर पर ही तैयार किए जाते थे। शुभ अवसरों पर माथे पर टीका करने के लिए कुमकुम, रोली तैयार करना भी इसमें शामिल था। हल्द्वानी रामपुर रोड के फूलचौड़ निवासी 55 वर्षीय तारा दत्त जोशी ने 76 वर्षीय मां भगवती देवी के नुस्खे को रोजगार का जरिया बना लिया। हर्बल उत्पादों की हल्द्वानी, अल्मोड़ा, रानीखेत बाजार में अच्छी डिमांड है। मेले महोत्सव में स्टॉल के अलावा हल्द्वानी के कई मॉल में भी हर्बल कुमकुम, रोली बिक रही है। इन दिनों सरस मेले में भी अच्छी काफी डिमांड देखने को मिल रह है।

जल्द चारधाम पहुंचेंगे उत्पाद
तारा जोशी ने बताया कि अभी हर माह औसतन दो कुंतल से अधिक कुमकुम, रोली बिक रही है। 10 ग्राम से 100 ग्राम तक की चार पैकिंग में उपलब्ध है। भविष्य में चारधाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री तक कुमकुम, रोली पहुंचाना चाहते हैं।

लोन से शुरू किया काम
इंटरमीडिएट पास तारा जोशी ने कुमाऊं मंडल विकास निगम से वीआरएस लेने के बाद कुछ समय सिडकुल में काम किया। तीन साल पहले कुमकुम, रोली बनाना शुरू किया। एक साल पहले खादी ग्रामोद्योग से दो लाख का लोन लेकर यूनिट स्थापित की। एक बार काम शुरू करने के बाद तारा जोशी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और काम को आगे बढ़ाते चले गए।

इस तरह होता है तैयार  
रोली को हल्दी, सुहागा पाउडर व नींबू के रस से तैयार किया जाता है। कुमकुम हल्दी, चंदन चुरा, मुलतानी मिट्टी के मिश्रण से बनाई जाती है। सभी उत्पादों को पीसने के बाद आपस में मिलाकर धूप में सुखाया जाता है। बाद में फिर पीसा जाता है। इस काम में पूरा परिवार जुटता है और दो बाहरी लोगों को भी रखा है। जोशी बताते हैं हर्बल उत्पाद पूजा के लिए शुद्ध होने के साथ स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।

Sunday, 10 March 2019

पेंटिंग की नई कला इजात, हीरा ने गेहूं के पौंध की डंठल से तैयार की एक से एक तस्वीरें

हीरा तस्वीरों को ऐसा उभारते हैं कि दिल छू लेती हैं।

गणेश पांडे। ब्रश व रंगों की मदद से कागज व कैनवास पर पेंटिंग बनाते आपने कइयों को देखा होगा, लेकिन हल्द्वानी के हीरा सिंह कोरंगा को रद्दी कागज और बेकार वस्तुओं से पेंटिंग बनाने में विशेषज्ञता हासिल है। गेहूं पौधे के डंठल, कुश घास से तैयार ये पेंटिंग ऐसी होती हैं कि देखने वाला देखता रह जाए। पुराने ग्रिटिंग कार्ड, कलैंडर से तैयार पेंटिंग भी लाजवाब होती है। 

हीरा की बनाई पेंटिंग में प्रकृति, देवी-देवता और मानवीय जनजीवन से लेकर राजनीतिक शख्सियत तक शामिल हैं। शहर के देवलचौड़ इलाके में रहने वाले हीरा सिंह परिवार पालने के लिए जनरल स्टोर की दुकान चलाते हैं। चित्रकला का जुनून ऐसा कि दुकान में बैठे-बैठे काउंटर पर पेंटिंग बनाने में मशगूल रहते हैं। दुकान का पिछला कमरा पेंटिंग से भरा है। दो साल में हीरा दो सौ से अधिक पेंटिंग बना चुके हैं।
चित्रकार हीरा सिंह कोरंगा।

तजुर्बे ने बना दिया कलाकार
 मूलरूप से पिथौरागढ़ जिले के रहने वाले 36 वर्षीय हीरा सिंह कोरंगा ने हाइस्कूल तक की पढ़ाई की है। हीरा बताते हैं उन्होंने किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं लिया। स्कूली दिनों में छात्राओं को कपड़े पर कढ़ाई करते देखते थे। यहीं से इच्छा जगी व प्रयोग शुरू कर दिया। धीरे-धीरे तजुर्बा होता गया और पेंटिंग सुधरती चली गई।

हुनर के हाथों को काम की कमी नहीं

बुढ़ापा वक्त का तकाजा है, जवानी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति।
हीरा का कहना है हुनर रखने वालों के लिए काम की कमी नहीं है। बतौर हीरा 'लोग रोजगार कहते हैं, मैं हुनर कहता हूं।' क्रिएटिव व लीक से हटकर काम करने वालों के लिए स्वरोजगार के तमाम मौके हैं।
तस्वीर ऐसी उकेरी की हूबहू उतर गई।
स्कूलों में जाकर बच्चों को सिखाने की इच्छा 
 घास व कागज की रद्दी के बाद हीरा सिंह अब बांस में प्रयोग शुरू कर रहे हैं। दूसरों को हुनरमंद बनाने की लालसा रखने वाले हीरा सिंह स्कूलों में जाकर बच्चों को पेंटिंग बनाना सिखाना चाहते हैं। एक-दो स्कूल से बात शुरू की है। हीरा का नौ साल का बेटा कृष्णा भी देखा-देखी पेंटिंग में रुचि लेने लगा है।

ऐसे भी शिक्षक, जिन्होंने खुद के प्रयासों से बदल दी सरकारी स्कूल की तस्वीर

शिक्षक भाष्कर जोशी।

सुबह देरी से स्कूल पहुंचने व शाम को घर लौटने की जल्दी में रहने वाले कर्मचारियों के लिए शिक्षक भाष्कर जोशी मिसाल बनकर उभरे हैं। अल्मोड़ा जिले के राजकीय प्राथमिक विद्यालय बजेला में कार्यरत जोशी ने बच्चों की पढ़ाई की खातिर गांव में डेरा डाल लिया।

मूलरूप से सोमेश्वर के रहने वाले जोशी ने अगस्त 2013 में बजेला स्कूल में कार्यभार संभाला। अल्मोड़ा से 55 किमी दूर बजेला स्कूल तक पहुंचने के लिए छह किमी पैदल चलना होता है। इसे देखते हुए जोशी स्कूल के पास किराए के कमरे में रहने लगे। तब विद्यालय में दस बच्चे थे। जोशी ने रचनात्मक गतिविधियों व नवाचारी प्रयोग से बच्चों में रुचि जगाई। नतीजतन अभिभावकों ने प्राइवेट स्कूल में पढऩे वाले बच्चों का सरकारी स्कूल में दाखिला करा दिया। आज विद्यालय में 24 बच्चे पढ़ते हैं।


प्रावि बजेला के बच्चों ने ऐसे मॉडल तैयार किए हैं कि कान्वेंट
 स्कूलों के बच्चे भी देखते रहे जाएं।
शनिवार को होती हैं नवाचार गतिविधि
विद्यालय में शनिवार को आर्ट-क्राफ्ट, फ्रेब्रिक पेंटिंग, चित्रकला, कविता, कहानी लेखन में बीतता है। बच्चे कॉमिक्स तैयार करते हैं। बजेला जागरण नाम से निकलने वाली मासिक पत्रिका में क्षेत्रीय समाचारों व बच्चों की एक्टिविटी प्रकाशित होती है।

अंग्रेजी में नाटक प्रस्तुत करते हैं बच्चे 
अंग्रेजी के नाम से भय खाने वाले बच्चे आज इंग्लिश में नाटक का मंचन करते हैं। इंग्लिश बोलने का धारा प्रवाह ऐसा कि अंग्रेजी मीडियम स्कूल के बच्चे पीछे छूट जाए। बच्चों के बनाए मॉडल देखने लायक होते हैं। शिक्षक ने अपने खर्च से विद्यालय में प्रोजेक्टर लगाया है। पांच साल में विद्यालय की तस्वीर बदल गई। स्वयंसेवी संस्थाएं स्कूल से जुडऩे लगी हैं।



Sunday, 23 December 2018

कुमाऊं की दो मशरूम गल्र्स, पढ़ाई से लेकर प्लांट शुरू करने तक का सफर


गणेश पांडे, हल्द्वानी : देहरादून की दिव्या रावत के बाद हल्द्वानी की दो युवतियों ने मशरूम उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाया है। एमएससी बायोटेक की पढ़ाई करने वाली दोनों युवतियों ने रोजगार की आश में महानगरों का रुख करने वाले युवाओं को आईना दिखाने का काम किया है। खास बात ये है कि दोनों किसान की बेटियां हैं। हल्द्वानी आनंदपुर की दीपिका बिष्ट (23) और मदनपुर गौलापार की श्वेता जोशी (23) ने स्वरोजगार की दिशा में अहम कदम बढ़ाया है। दोनों ने हल्द्वानी से 12 किमी दूर मदनपुर गांव में मशरूम प्लांट शुरू किया है। मशरूम उत्पादन की शुरुआत बटन प्रजाति से हुई है। स्कूल में पढ़ाने के बाद दोनों प्लांट में मशरूम उत्पादन का काम देखती है। छुट्टी का दिन प्लांट में बीतता है। मशरूम की पहली खेप बाजार में आने के लिए तैयार है।




देहरादून से लिया प्रशिक्षण
 एमएससी की पढ़ाई करने के बाद दीपिका व श्वेता ने टैगजीन ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट देहरादून से एक माह का मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। इस दौरान मशरूम की उपयोगिता, उत्पादन, देखरेख आदि की बारीकी सीखी।
 

परिवार ने दिया साथ, बढ़ाया हौसला 
श्वेता का भाई सीए की पढ़ाई कर रहे और बहन बीकॉम की शिक्षा ले रही है। दीपिका के भाई एमकॉम कर रहे हैं। श्वेता के पिता भुवन चंद्र जोशी, दीपिका के पिता हरीश सिंह बिष्ट व परिवार के अन्य सदस्यों ने दोनों का हौसला बढ़ाया। दून अल्पाइन कॉलेज के डॉ. कार्तिक उनियाल, उत्तम कुमार ने भी प्रेरित किया।
 

छह साल पहले शुरू हुई दोस्ती 
हल्द्वानी एमबीपीजी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई करने के दौरान छह साल पहले दोनों की दोस्ती हुई। बाद में देहरादून अल्पाइन इंस्टीट्यूट से एमएससी बायोटेक किया।
 

खुद के पैसे से शुरू किया प्लांट
दीपिका ग्रीनवुड ग्लोबल स्कूल व श्वेता वेंडी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाती हैं। स्कूल से मिलने वाली राशि से दोनों ने प्लांट शुरू किया। 20 फिट गुणा 17 फिट का प्लांट के लिए 50 हजार रुपये निवेश किया। लोहे के एंगल में बांस, सुतली, पॉलीथिन आदि से प्लांट का आकार दिया।
 

खरीदारी को घर पर आ रहे लोग 
मशरूम की विधिवत बिक्री शुरू नहीं हुई है, लेकिन खरीदारी के लिए रिश्तेदार व परिचित प्लांट पर आने लगे हैं। प्रचार के लिए दोनों ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाया है। होटल, रेस्टोरेंट संचालकों से भी संपर्क कर रही हैं।
 

इस तहत व्यवस्थित किया तापमान 
प्लांट के ऊपर प्लास्टिक की पन्नी डाली है। पन्नी ठंडी रहे इसके लिए बाहर से पुराने बोरे लगाए हैं। बोरों पर पानी का छिड़का जाता है। इससे प्लास्टिक ठंडी रहती है व भीतर का तापमान बाहर की अपेक्षा कम रहता है।

Monday, 15 October 2018

पहल: सोशल मीडिया से बचा रहे लोक की थात


गणेश पांडे:: बदलते समय की चकाचौंध का असर उत्तराखंड की लोक परंपराओं पर भी पड़ा है। शादी-विवाह जैसे शुभ अवसरों पर शगुन आंखर (मांगलिक गीत) गाने की परंपरा धीरे-धीरे गुजरे जमाने की बात होते जा रही है। मांगलिक अवसरों पर बुजुर्ग गीदारों की कर्णप्रिय धुन अब कम सुनाई पड़ती है। शगुन आंखर गायन की अद्भुत परंपरा फिर से जीवंत हो, इसके लिए कुछ लोगों ने नायाब पहल की है।
मांगलिक गीतों को विवाह, नामकरण, यज्ञोपवीत जैसे अवसर पर गाया जाता है। ङ्क्षहदू शास्त्रों में भी मांगलिक गीत गाने का उल्लेख मिलता है। मगर बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे धीरे पीछे छूटती जा रही है। घरों में होने वाले विवाह आयोजन होटल, बारात घर, बैंक्वेट हॉल तक पहुंच गए हैं। ऐसे में गीदारों को खोलना मुश्किल हो जाता है। संस्कृति प्रेमियों ने मांगलिक गीतों ऑडियो तैयार कर यूट्यूब पर अपलोड की है। जिन्हें शुभअवसरों पर मोबाइल फोन पर कहीं भी बजाया जा सकेगा।


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इन गीतों को किया संग्रहित
पुण्य वाचन गीत, हल्दी गीत, देव निमंत्रण, गणेश पूजन, मातृ पूजा, कलश पूजा, पितृ निमंत्रण, नवग्रह पूजा, ज्योति पूजा, संध्या गीत, निमंत्रण गीत, सुवाल पथाई गीत, भात न्यूतने के गीत, बारात आने के गीत, धूली अघ्र्य गीत, कन्यादान तैयारी गीत, शय्या दान गीत, विदाई गीत, नामकरण गीत, बन्ना-बन्नी गीत, मंगल गीत।
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शगुन आंखर के 56 गीतों का संकलन
मांगलिक गीतों के गुलदस्ते में 20 अलग-अलग प्रकार के 56 गीतों को संकलित किया गया है। जिन्हें मौके के अनुसार बजाया जा सकता है। संकलन कर्ता लता कुंजवाल कहती हैं इससे नई पीढ़ी अपनी प्राचीन परंपरा से रूबरू हो सकेगी।
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इनका रहा योगदान
शिखर सांस्कृतिक विकास समिति अल्मोड़ा की लता कुंजवाल के शोध व संकलन से शगुन आंखर की ऑडियो तैयार हुई। लता कुंजवाल, मीनू जोशी, शमिष्ठा बिष्ट की आवाज, हेमंत बिष्ट के पाश्र्व स्वर, अमर सब्बरवाल, आनंद बिष्ट के संगीत, मिक्सिंग इंजीनियर नितेश बिष्ट, जुगल किशोर पेटशाली के परामर्श से गीत तैयार हुए।
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आज की पीढ़ी शगुन आंखरों को भूलती जा रही है। बच्चों को तो मालूम भी नहीं कि ऐसी भी कोई परंपरा रही है। ऐसे में शगुन आंखर को सोशल प्लेटफार्म पर लाना सराहनीय प्रयास है।
- जुगल किशोर पेटशाली, लेखक एवं संस्कृति कर्मी

Wednesday, 10 October 2018

दूसरों के घर चूल्हा-चौंका करना पसंद नहीं था, इसलिए चलाने लगी ई-रिक्शा


उत्तराखंड की पहली महिला ई-रिक्शा चालक के तौर पर पहचान बनाने वाली रानी मैसी आधी आबादी के लिए मिसाल बन चुकी हैं। रानी कहती हैं ढ़ाई साल पहले अगर मैंने साहस नहीं दिखाया होता तो आज भी वह गुमनाम होती। परिवार पहले की तरह मुश्किलों में होगा। बेटी की पढ़ाई पूरी हो पाती या नहीं, यह कहते हुए उनका गला भर आता है..।
गांधी नगर वार्ड एक निवासी 45 वर्षीय रानी मैसी के पति बबलू मैसी माली का काम करते थे। तीन साल पहले एक दिन गिरने से उनके सिर पर चोट लग गई। दिमागी चोट के कारण अक्सर उन्हें चक्कर आ जाता। शहर के निजी अस्पताल से इलाज चला। महीने की हजार-बारह सौ की दवा का खर्च उठाना परिवार पर भारी पड़ रहा था। इकलौती बेटी मोहिनी ने कुछ माह पहले ही मुरादाबाद के नर्सिंग कॉलेज में दाखिला लिया था। परिवार के एकमात्र कमाऊ व्यक्ति के बिस्तर पकडऩे से परिवार आर्थिक संकट से घिर गया।
आज रानी ई-रिक्शा की एजेंसी व सर्विस सेंटर चला रही हैं। देवर, एक कारीगर व एक युवती दुकान पर रहते हैं। जीएनएम की पढ़ाई पूरी कर चुकी मोहिनी ट्रेनिंग कर रही है। रानी के लिए यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था।

 

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पहले ताने देते थे अब देते सम्मान
आठवीं तक पढ़ी रानी के सामने आसान विकल्प था कि दूसरों के घरों का चूल्हा-बर्तन करे। आसपास के लोग भी यही सुझाते थे। ई-रिक्शा चलाने की ठानी तो महिलाएं ताना मारती अब ये आदमियों वाला करेगी। हालांकि अब यही लोग रानी को सम्मान देते हैं।
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महिलाओं को बना रही आत्मनिर्भर
रानी मैसी अब तक तीन महिलाओं को ई-रिक्शा चला सीखा चुकी हैं। हल्द्वानी के अलावा बाजपुर, किच्छा से महिलाएं प्रशिक्षण लेने पहुंच रही हैं। रानी कहती हैं ई-रिक्शा ही नहीं, स्वाभिमान जगाने वाले कई दूसरे कामों से भी महिलाएं खुद के पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। ठान लें तो कोई काम मुश्किल नहीं।
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बढ़ गया आत्मविश्वास
रानी को प्रेरित करने में देवर एस चरण 'बंटीÓ का अहम योगदान रहा। रानी समूह से जुड़ी। बैंक से ई-रिक्शा फाइनेंस कराया। कभी साइकिल तक को हाथ न लगाने वाली रानी ने देवर से ई-रिक्शा चलाना सीखा। आत्मविश्वास बढ़ा तो बाद में स्कूटी चलाना सीखी। गाजियाबाद, मुरादाबाद स्कूटी से आती-जाती हैं।

(- गणेश पांडे की रानी से बातचीत पर आधारित)

Monday, 8 October 2018

अभिनय के लिए द्वारपाल और नंदी छोड़ आए खाना

पर्दे के पीछे की लीला : लाइव

लीला पर्दे के आगे ही नहीं पीछे भी होती है। कक्षा सात में पढऩे वाला अभिषेक व आठवीं का दीपक स्कूल से लौटने ही रामलीला मैदान पहुंच गए हैं। वह सीधे डे्रसिंग रूम पहुंचते हैं। दोपहर के दो बजने में अभी कुछ मिनट बाकी हैं, लेकिन कलाकारों का मेकअप शुरू हो गया है। साथियों को तैयार देख अभिषेक व दीपक मेकअप आर्टिस्टों की तरफ लपकते हैं। पिछली पंक्ति में बैठा दीपक साथियों से कहना है आज स्कूल था तो आने में देर हो गई। खाना भी नहीं खा पाया। जवाब में अभिषेक कुछ कहता, हाथ में ब्रश थामे गोस्वामी अंकल बोल पड़े, अब किसी अन्य कलाकार को तैयार नहीं किया जाएगा।

उत्साहित दिख रहे अभिषेक और दीपक के चेहरे पर अब थोड़ी चिंता दिखने लगी है। गोस्वामी अंकल अपने साथी गब्बर और ठाकुर की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं- देखो, अब किसी को तैयार मत करना। जो लिस्ट हमें मिली थी उसके अनुसार रावण सेना के लिए चार राक्षस व ऋषि-मुनि के किरदार के लिए चार पात्र तैयार हो गए हैं। यह सुन अभिषेक बाहर की तरफ चला गया। बाहर कुछ लोग स्टेज की सजावट में लगे हैं।
बाहर की तरफ गया अभिषेक पात्र जुटाने की जिम्मेदारी देख रहे अंकल को ड्रेसिंग रूम में ले आया। अभिषेक देरी से आने की मजबूरी बताते हुए कहता है उसे रोल करना है। कुछ सोचने के बाद दीपक, अभिषेक को द्वारपाल व हेमंत को नंदी का रोल देने की सहमति बनती है। तीनों मेकअप आर्टिस्ट के सामने तैयार होने के लिए बैठ जाते हैं। तीनों के चेहरे पर जीत की चमक बिखर चुकी है। गोस्वामी अंकल कहते हैं थोड़ी जल्दी हाथ चलाएं, साढ़े चार बजे से लीला शुरू हो जाएगी।
इधर, ड्रेसिंग रूम में अब थोड़ी रोनक बढऩे लगी है। करीब २५-३० वर्षों से शहर की प्राचीन रामलीला से जुड़े मेकअप आर्टिस्ट नरेश गोस्वामी, गब्बर गौड़, ठाकुर विश्व प्रकाश पहले किरदार निभाते थे। अब पर्दे के पीछे रहकर राम सेवा करते हैं।
(- रामलीला के ड्रेसिंग रूम से गणेश पांडे)

Thursday, 13 September 2018

शास्त्र सम्मत नहीं है पीओपी के गणेश की स्थापना

गणेश पांडे : 
गणपति बप्पा मोरया की धुन एक बार फिर गूंजने लगी है। जगह-जगह आकर्षक पंडाल सजे हैं। कुमाऊं का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी में तो हर तरफ पंडाल ही पंडाल हैं। मानो एक तरह से देखा-देखी का चलन चल पड़ा है। दो वर्ष पहले मैंने पड़ताल करते हुए पाया था कि हल्द्वानी में गणेश महोत्सव मनाने की परंपरा की शुरुआत करीब 12 साल पहले 2004 में हुई। यह परंपरा इतनी तेजी से फैली कि चौदह साल में 35 से 40 जगहों पर सार्वजनिक आयोजन होने लगे। घरों व दो-तीन परिवारों के बीच होने वाले आयोजन गिनती में शामिल नहीं हैं। इन्हें शामिल किया जाए तो संख्या सैकड़े से ऊपर पहुंचती है।

दरअसल, बात महोत्सव के विस्तार की नहीं है, बल्कि गणेश महोत्सव, दुर्गा महोत्सव जैसे धार्मिक आयोजनों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से निर्मित मूर्तियों का बढ़ता चलन और मूर्तियों को आकर्षक रूप देने के लिए जहरीले कैमिकल का प्रयोग चिंता पैदा करने वाला है। आस्था से जुड़ा मामला होने से लोग इस पर बात करने से कतराते रहते हैं।
हमारे धर्म, शास्त्रों से हमें मूर्ति पूजन की परंपरा का ज्ञान होता है। मूर्ति पूजन की परंपरा कैसी हो, इसका ज्ञान भी शास्त्र हमें कराते हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा और सब कुछ रेडीमेड चाहने के दौर में इस पहलू को हम भुलते जा रहे हैं। पीओपी और कैमिकल युक्त मूर्ति पूजन की परंपरा जो आज चल पड़ी है, उसे शास्त्र सम्मत नहीं कहा जा सकता। दरअसल, हिंदू शास्त्रों में मिट्टी की प्रतिमा का पूजन करने के तमाम संदर्भ मिलते हैं। मिट्टी की प्रतिमा का पूजन इसलिए भी सर्वश्रेष्ठ और शुभ माना जाता है क्योंकि मिट्टी पवित्र होती है। मिट्टी में अग्नि, वायु, जल, आकाश व पृथ्वी जैसे पंच तत्व विद्यमान रहते हैं।
पीओपी से निर्मित मूर्तियों का पूजन शास्त्र सम्मत क्यों नहीं है अब इस पर बात। ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणेश खंड में उल्लेख है कि माता पार्वती ने मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाकर उसका प्राकट्य किया था। भगवती गौरी मिट्टी से बने बालक का विग्रह बनाकर प्राण तत्व का आह्वान करती हैं। जिस तरह पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में चमड़ा, एल्युमीनियम आदि का उपयोग वर्जित माना गया है, इसी तरह प्लास्टर ऑफ पेरिस को भी शास्त्र सम्मत नहीं माना जा सकता।
अब बात पीओपी से बनी प्रतिमा के नुकसान पर। पीओपी से निर्मित मूर्तियों पर रसायनिक कलर किए जाते हैं, जो पानी को जहरीला बना देते हैं। जिससे कई तरह के चर्म रोग और अन्य घातक बीमारियां होने का खतरा रहता है। जिस नदी, तालाब में मूर्तियों को प्रवाहित किया जाता है, उसमें रहने वाली मछली आदि जलीय जंतुओं के जीवन को भी इससे खतरा उत्पन्न हो जाता है।
अब व्यवहारिक पहलू पर बात करते हैं। पीओपी से निर्मित मूर्तियों को सांचे से बनाया जाता है। जिससे इनकी फिनिशिंग अच्छी आती है और चमकदार कलर करने से शाइनिंग भी अच्छी मिलती है। अंदर से खोखली होने से मिट्टी की मूर्ति की अपेक्षा पीओपी निर्मित मूर्तियां थोड़ी हल्की होती है। अब सवाल है कि क्या अच्छी शाइनिंग व फिनिशिंग मात्र के लिए प्रकृति और शास्त्रों से खिलवाड़ किया जाए। वह भी तब जब हमारे शास्त्र प्रकृति पूजन का संदेश देते हैं। फिर भगवान गणेश तो प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं। विभिन्न धार्मिक अवसरों पर मिट्टी व गाय के गोबर से गणेशजी की स्थापना होती है। दूब के तिनके मात्र से प्रसन्न होने वाले भगवान गणेश के लिए ऊंची और आकर्षक मूर्तियों का भला कोई औचित्य भी है।

Saturday, 11 August 2018

कहानी : सैलरी



सतेंद्र डंडरियाल  :

सैलरी कब छोटी से बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। तब मां ने कहा था, लो आ गई तुम्हारी सैलरी, अब संभालो इसे। मोहल्ले वालों ने प्यार-प्यार में बच्ची का नाम सैलरी ही रख दिया। प्यार से सब उसे सैलरी ही बुलाते थे।

रामदुलारी पेट से थी। नवां महीना चल रहा था। अस्पताल और दाई के खर्चों के लिए रामदुलारी की सास अपने बेटे रामवतार को बार-बार फोन कर कहती, पैसे भेज दो तो रामअवतार का यही जवाब होता कि अभी सैलरी नहीं आई। एक दिन वह वक्त भी आया जब रामदुलारी की बेटी पैदा हुई। मां ने बेटे को खुशखबरी देने के लिए फोन किया और साथ में यह भी कह दिया कि तुम्हारी सैलरी आ गई। मां का फोन नंबर देखते ही बेटे को लगा कि जरूर सैलरी के बारे में पूछेगी। उसने फोन उठाया, मां के कुछ कहने से पहले ही बोल पड़ा अभी सैलरी नहीं आई। मां ने कहा वो छोड़ अब तो सचमुच तेरी सैलरी आ गई, बेटी पैदा हुई है। रामअवतार बोला बहुत अच्छा है मां मैं जल्द ही छुट्टी लेकर घर आऊंगा।

गांव से दूर रामअवतार शहर की एक फैक्ट्री में चौकीदारी का काम करता था। फैक्ट्री काफी समय से बंद पड़ी थी। रामअवतार की जिम्मेदारी में केवल फैक्ट्री के बंद गेट पर पहरा देना था। तीन साल पहले शादी हुई थी। उसके बाद रामअवतार रोजगार की तलाश में शहर आ गया। यहां जैसे तैसे एक फैक्ट्री में चौकीदारी की नौकरी मिल गई। दो-तीन महीने में फैक्ट्री का मैनेजर एक चक्कर लगाकर रामअवतार को कुछ पैसे दे जाता। तीन-चार महीनों में भी उसे एक महीने की तनख्वाह मिलती। रहने का ठिकाना फैक्ट्री में ही था। कभी कभार वह घर थोड़ा बहुत पैसे भेज दिया करता था। शादी के बाद उसके घर में पहला बच्चा होने वाला था। रामअवतार भीतर-ही-भीतर बहुत खुश था, लेकिन इस बार छह महीने से उसे एक भी पैसा नहीं मिला। उसके पास फैक्ट्री के मैनेजर का फोन नंबर तो था, पर बार-बार फोन करने के बाद भी मैनेजर यही कहता ठीक है कल आऊंगा परसो आऊंगा, तुम्हारे पैसे कहीं भागे नहीं जा रहे हैं। प्रसव के दौरान वह रामदुलारी को देखने भी नहीं जा सका। बच्ची पैदा होने के दस दिन बाद रामअवतार गांव पहुंचा। घर पहुंचते ही मां ने कहा यह देख तेरी सैलरी आ गई। रामअवतार ने अपनी फूल सी बच्ची को गोद में उठाया तो खुशी से उसकी आंखों में आंसू छलक गए। खुशी खुशी तीन-चार दिन घर में बिताए और वापस शहर लौट गया। घर में बच्चे को देखने के लिए आसपास की औरतें आती तो मां कहती यह सैलरी है। सैलरी जब पेट में थी तब इसके बाप की सैलरी नहीं आई और यह पहले आ गई। यह सब वह अपनी बहू को ताने के तौर पर सुनाती। मोहल्ले की औरतें पुचकारती सैलरी को थी और सुनाती रामदुलारी को।
वक्त बीत रहा था सैलरी अब बड़ी हो रही थी। रामअवतार जब कभी घर फोन करता तो रामदुलारी कहती तुम्हारी सैलरी तुम्हें बहुत याद करती है। टुकुर टुकुर तुम्हारी फोटो देखती है। तुम्हारी आवाज सुनती है, अब तीन महीने की हो गई है। इस बार घर आओगे तो सैलरी के लिए अच्छी सी फ्रॉक लाना।
बरसात का मौसम बीत रहा था। अब सर्दियां दस्तक देने वाली थी। फैक्ट्री के कमरे में रामअवतार के पास एक चारपाई कुछ बर्तन और पांच किलो के छोटे सिलेंडर के अलावा कुछ भी नहीं था। जैसे तैसे दिन काट रहे रामअवतार की आंखों के आगे रात दिन की बच्ची का चेहरा घूमता। फूल सा मासूम खिलखिलाता हुआ चेहरा। सपने में उसे रंग बिरंगी फ्रॉक नजर आती। मई के महीने की सैलरी रामअवतार को सितंबर में मिली। अगले ही दिन वह बाजार गया। कई दुकानों के चक्कर लगाने के बाद एक फ्रॉक पसंद आई। जिसे उसने अपनी बच्ची के लिए खरीद लिया। मैनेजर से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर गांव पहुंचा। मां से मुलाकात हुई। मां ने फिर छूटते ही कह दिया अब तो तुम्हारी सैलरी टाइम पर आ जाती होगी।
हां मां टाइम पर तो क्या। गहरी सांस भरते हुए रामअवतार ने कहा था। बोला, मैनेजर साहब ज्यादातर बाहर रहते हैं। जब शहर आते हैं तो सैलरी भी दे जाते हैं।
मैं सोच रही हूं घर बहुत पुराना हो चुका है इस बार की बरसात में जगह जगह से टपकता रहा। थोड़े बहुत पैसे हो जाते तो छत की मरम्मत करवा देते। मैंने मिस्त्री से बात की थी वो बोला दस हजार लगेंगे।
हां मां मरम्मत तो करवानी पड़ेगी नहीं तो छत गिर जाएगी। अगली बार सैलरी आएगी तो पैसे भेज दूंगा। अरे इस सैलरी को दूध क्यों नहीं पिलाती है। कितनी देर से चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा रखा है। रामदुलारी बोली मांजी अभी कुछ देर पहले ही तो पिलाया था। फिर भूख लग गई होगी।
शाम ढल रही थी रामअवतार अगली सुबह शहर जाने की तैयारी में जुटा हुआ था। रात को भोजन के बाद रामदुलारी से बात करने की फुर्सत मिली। तो कहने लगा हम अपनी बेटी को खूब पढ़ाएंगे। मैं इसे शहर के अच्छे स्कूल में भर्ती करवाऊंगा। देखना एक दिन हमारी बेटी हमारा नाम रोशन करेगी।
और सुनो! तुम उसे सैलरी-सैलरी मत कहा करो। मुझे यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं। बच्चों का जैसा नाम होता है वैसा नाम रखो। अभी तो सब प्यार-प्यार में हंसी-ठिठोली में सैलरी सैलरी कह रहे हैं। बाद में कहीं यही नाम पड़ गया तो। कितनी सुंदर और गोल मटोल है हमारी बच्ची। इसका नाम तो राधा होना चाहिए। तुम स्कूल में यही नाम लिखवाना। अरे सुन रही हो या सो गई। लो उसने सुना ही नहीं और मैं खामखां नाम सुझाने में उलझा रहा।
सुबह की पहली बस से रामअवतार शहर आ गया। फिर से बंद फैक्ट्री के गेट पर चौकीदारी करने के लिए। अब अक्सर रामदुलारी से फोन पर बातें होती रहती। बच्ची के हाल-चाल उसकी शरारतें सुनकर वह मन ही मन खुश होता। समय पंख लगा कर मानो उड़ रहा था। रामदुलारी ने कहा सैलरी का आंगनबाड़ी में दाखिला करवा दिया है। क्या नाम लिखवाया। रामअवतार ने उत्सुकता वश पूछा था। रामदुलारी बोली, नाम तो सैलरी ही लिखा है।
रामअवतार सोचने लगा नाम में क्या रखा है सैलरी ही सही। वैसे भी सैलरी के पीछे दुनिया पागल है। आंगनबाड़ी से होते हुए सैलरी अब स्कूल जाने लगी। यहां भी मास्टरजी ने उसका नाम सैलरी लिख दिया। बोले बड़ा अंग्रेजी सा नाम रखा है मां-बाप ने तेरा। बूढ़ी मां अब अक्सर बीमार रहने लगी उम्र का तकाजा था। रामअवतार के पैदा होने के कुछ ही महीनों के बाद उसके बापू चल बसे। तब से चार बच्चों की परवरिश का जिम्मा अकेले ही सम्भाला। तीन बेटियों के हाथ पीले किए। चार भाई बहिनों में सबसे छोटे रामवतार की जिम्मेदारी सिर पर थी वह भी पूरी हुई। मन में बिना कोई बोझ लिए एक दिन बूढ़ी मां खाली हाथ दुनिया से रुखसत हो गई।
रामअवतार कई दिनों तक घर में गुमसुम रहा। अब उसने रामदुलारी को अपने साथ शहर ले जाने का फैसला किया। तीन साल की हो चुकी सैलरी घर में भीड़भाड़ देखकर काफी खुश नजर आ रही थी। इस माहौल में भी लोग प्यार से कह देते सैलरी तो आप अपने बापू के साथ शहर जाएगी। टिन के बक्शे में थोड़ा बहुत सामान समेट कर रामअवतार अपनी पत्नी और बच्ची को लेकर शहर रवाना हो गया। पास के एक स्कूल में बच्ची का दाखिला करा दिया। पंचायत से मिले प्रमाणपत्र के आधार पर स्कूल में बच्ची का नाम सैलरी ही दर्ज किया गया।
वक्त यूंही बीत रहा था। घर का खर्च चलाने के लिए अब सैलरी की मां भी आसपास के घरों में काम करने लगी। सैलरी धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। इधर काफी समय से बंद पड़ी फैक्ट्री के दोबारा खुलने की भी सुगबुगाहट ने रामवतार के साथ ही कई मजदूरों के चेहरों पर खुशी ला दी। रामअवतार सोचने लगा फैक्ट्री चालू हो जाएगी तो कम से कम उसे सैलरी वक्त पर मिल जाया करेगी।
सैलरी को धीरे-धीरे अपने नाम का मतलब भी समझ आने लगा। पढ़ाई में उसका खूब मन लगता। रामदुलारी भी कहती पढ़ेगी नहीं तो मेरे जैसे अंगूठा छाप रह जाएगी। पहली ही कक्षा में सैलरी ने अव्वल दर्जा हासिल किया। साल-दर-साल सैलरी बढ़ती गई। प्राथमिक से उच्च प्राथमिक स्कूल में दाखिला हुआ तो स्कूल में उसके नाम को लेकर काफी चर्चाएं होती।
साथ पढऩे वाली लड़कियां उससे पूछती तुम्हारा नाम सैलरी किसने रखा, बड़ा इंट्रस्टिंग नाम है।
यह नाम मुझे मेरी दादी ने दिया था। मैंने एक दिन मां से पूछा था तो मां ने कहा तेरी दादी ही तेरा नाम रख गई।
सैलरी इस नाम को बचपन से सुनते आ रही थी। इसलिए उसे यह नाम उसे कभी अटपटा नहीं लगा। कई बार उसे स्कूल के शिक्षकों ने सुझाव भी दिया कि तुम अपना नाम बदल लो, लेकिन सैलरी ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। जो नाम था वह यूं ही चलता रहा। हाईस्कूल में एक बार फिर मौका दिया गया कि वह अपना नाम चेंज करवाना चाहे तो करवा सकती है। बस इसके लिए एक शपथपत्र देना होगा, लेकिन सैलरी ने अपना नाम चेंज नहीं करवाया। रामअवतार बहुत खुश होता कि उनके खानदान से पहली बार कोई दसवीं तक पहुंचा है। वरना ज्यादातर पांचवीं पास के बाद ही हार मान गए।
सैलरी अब अपने नाम का अर्थ बहुत अच्छी तरह से जानती थी। उसे पता चला कि 'सैलरी' शब्द लैटिन भाषा के 'सैलेनियम' से आया है, जिसका मतलब होता है 'नमक'। प्राचीन ईरान में इसका मतलब था, राजा की सेवा करना और भरण-पोषण के तौर पर राजा से सैलरी प्राप्त करना।
सैलरी ने जब अपने बापू और मां को यह बात बताई तो दोनों खूब हंसे। रामअवतार बोले तेरी दादी को शायद यह बात पता रही होगी। उन्होंने कभी हमें तो नहीं बताया, लेकिन तुम्हारा नाम सैलरी रख दिया। जिसकी सबको जरूरत है। सैलरी ने दसवीं में स्कूल टॉप किया तो रामअवतार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आज उसने मिठाई बांटी। सैलरी अब स्कूल में सबकी चहेती बन गई। शिक्षक कहते बेटी हाईस्कूल में तुमने हमारा नाम रोशन किया। अब आगे तुमसे उम्मीदें बढ़ गई हैं। तुम हमारे स्कूल का नाम पूरे जिले में ऊंचा करो।
सब कुछ ठीक चल रहा था सैलरी अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ रही थी। अब वह वक्त भी आया जिसका उसे बेसब्री से इंतजार था। स्कूल की शिक्षा पूरी हुई और कॉलेज में दाखिला लिया। इधर एक बार फिर फैक्ट्री में कामकाज शुरु हो चुका था। बाइस-तेईस सालों में पहली बार रामअवतार की सैलरी वक्त पर आई। ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद सैलरी ने प्रशासनिक सेवाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए दिन रात एक कर दिया। वह मां से कहती जब मैं कलेक्टर बन जाऊंगी तो पहली सैलरी तुम्हारे हाथ में दूंगी। रामअवतार उसकी बातों को सुनकर कहता सैलरी कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला। काश इस वक्त मां जिंदा होती तो मैं कहता देखो मां मेरी सैलरी भी बढ़ गई और वक्त पर भी आने लगी है, बल्कि अब तो बोनस मिलने वाला है। हंसी के ठहाके लगा रहे रामअवतार और रामदुलारी का मुंह सैलरी ने लड्डू से बंद कर दिया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Thursday, 28 June 2018

गांव में लगाया इको फ्रेंडली प्लांट, हिमांशु के प्रयास से खुलेगी रिवर्स माइग्रेशन की राह


हिमांशु पंत

गणेश पांडे, हल्द्वानी : रोजगार की तलाश में अपनी माटी छोडऩे वाले युवाओं के लिए सीमांत पिथौरागढ़ जिले के 33 वर्षीय हिमांशु पंत ने मिसाल कायम की है। बेरीनाग तहसील के बजेत (कालाशिला) गांव निवासी हिमांशु ने रोजगार की तलाश में शहरों की खाक छानने के बजाय अपने गांव में इंको फ्रेंडली बैग तैयार करने का प्लांट लगाया है। हिमांशु ने अपने प्लांट को ग्रीन हिमालय इको फ्रेंडली बैग नाम किया है। स्थापना के पांच माह में ही यह प्लांट आसपास के गांवों के आठ युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। हिमांशु को उम्मीद है अगले छह माह में वह 25 से 30 युवाओं को अपने प्लांट से जोड़ चुके होंगे। हिमांशु की पहल ने रोजीरोटी के खातिर शहर पलायन कर गए युवाओं को रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीद भी जगाई है।


ऐसे आया आइडिया
बीएड और अकाउंट की पढ़ाई करने वाले हिमांशु दस साल तक एक शहर से दूसरे शहर भटकते रहे। कभी टीचिंग की तो कभी सीए के साथ काम किया। फैक्ट्री में भी हाथ आजमाया। हिमांशु बताते हैं पांच साल पहले से हल्द्वानी में एलआइसी के मार्केटिंग विभाग में काम करता था। विचार आया कि दूसरे की योजनाओं का प्रचार करने के बजाय अपना काम किया जाए। एक दोस्त ने इको फ्रेंडली बैग तैयार करने के प्लांट का प्रोजेक्ट दिखाया तो इस पर काम करने का मन बना लिया।

परिवार ने दिया हौसला
हिमांशु बताते हैं प्लांट लगाने से पहले मन में सवाल था कि काम चलेगा कि नहीं। पिता और छोटे भाइयों ने प्रोत्साहित किया। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत आवेदन करने पर 25 लाख का लोन स्वीकृत हो गया। करीब इतनी ही राशि पिता नारायण पंत के (अस्पताल से सुपरवाइजर पद से) रिटायर्ड होने पर मिली रकम से मिलाकर जनवरी में प्लांट व प्रिंटिंग मशीन लगा लिया। हिमांशु का एक भाई सीए के साथ काम करता है, दूसरा एयरफोर्स में कार्यरत है।
बेरीनाग स्थित प्लांट में इको फ्रेंडली बैग तैयार करते युवा।
 

हल्द्वानी तक से आ रही डिमांड
पांच माह पहले महज दस दुकानों से शुरू हुआ काम आज शहरों तक पहुंच गया है। हिमांशु बताते है पहले बेरीनाग बाजार से ही डिमांड आती थी। अब पिथौरागढ़, बागेश्वर, गरुड़, अल्मोड़ा, चंपावत के साथ हल्द्वानी से भी बैग की डिमांड आ रही है। प्लांट में डी-कट, यू-कट बैग के साथ शॉपिंग में प्रयोग होने वाले लूप (फीते) वाले बैग भी तैयार होते हैं।

छह से 15 हजार देते हैं वेतन
प्लांट में काम करने वाले युवाओं को छह हजार से 16 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता है। आपरेटर को छोड़ शेष आठ युवक स्थानीय हैं। कम वेतन वाले युवाओं से पार्ट टाइम काम किया जाता है।

Saturday, 9 June 2018

पप्पू कार्की : मुश्किलों को हराया, खुद जिंदगी से हार गए

:::स्मृति शेष:::

 गणेश पांडे, हल्द्वानी : मोर्चरी के बाहर पोस्टमार्टम के लिए लाए जाने वाले के परिजन, पुलिस वाले और पत्रकार ही दिखाई देते हैं। मगर शनिवार को मोर्चरी के बाहर नजारा दूसरा था। भीड़ में तमाम लोग ऐसे थे, लोक गायक पप्पू कार्की जिनके न तो रिश्तेदार थे और न पारिवारिक संबंधी। कई लोग अपने पसंदीदा कलाकार की अंतिम झलक पाने उमड़ आए थे। लोगों के दिलों में राज करने का ये मुकाम कार्की को लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुआ था।

वर्ष 1998 में महज 14 वर्ष की आयु में पप्पू कार्की ने पहला गीत रिकॉर्ड कराया। मगर पहचान 2010 में आई 'झम्म लागछी' एलबम के 'डीडीहाट की झमना छोरी..' गीत से मिली। 12 साल के संघर्ष में पप्पूदा ने दिल्ली समेत कई महानगरों में हाथ-पांव मारे। 2003 से 2006 तक दिल्ली में पेट्रोल पंप, प्रिंटिंग प्रेस और बैंक में चपरासी तक की नौकरी करनी पड़ी। इसके बाद रुद्रपुर का रुख किया और दो साल डाबर कपंनी में ठेकेदारी प्रथा में काम किया। पिछले दिनों अपने स्टूडियो में मुलाकात के दौरान पप्पूदा ने बताया था कि दर-दर भटकाव से परेशान होकर उन्होंने गांव लौटने का मन बना लिया था। इसी दौरान लोक गायक प्रह्लाद मेहरा व चांदनी इंटरप्राइजेज के नरेंद्र टोलिया के साथ मिलकर 'झम्म लागछी' एलबम की, इससे बाद पप्पू कार्की की जमीन तैयार होती चली गई। हालिया 'तेरी रंग्याली पिछौड़ी' वीडियो गीत एक मिलियन से ज्यादा लोग देख चुके हैं।
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पंचेश्वर बांध पर लाना चाहते थे गीत
लोक गायक पप्पू कार्की के करीबी रहे लोक गायक संदीप आर्य ने बताया कि पप्पूदा ने पंश्चेश्वर बांध पर लोक गीत रचा था। 'न छोडू ईजा की माटी, न छोडू आपणी थाती' यानी अपनी मातृभूमि को नहीं छोड़ंगे और न अपनी जड़ों को छोड़ेंगे। सही समय आने पर वह इसे लोगों के बीच लाने की सोच रहे थे।
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ये सपने भी रह गए अधूरे
नीलम कंपनी के साथ कार्की तीन गीत, 'सुनै की थाली मा', 'रिमा-झिमा पानी' और 'ओ हिमा ह्यू पड़ो हिमाला' की रिकॉर्डिंग के लिए दिल्ली जाने वाले थे। इसके लिए 11 से 13 जून की तिथि तय थी। संदीप ने बताया उन्हें 10 जून की रात निकलना था। इस कारण वह रात ही गौनियारों से लौटने की बात कह रहे थे। छित्कू हिवाल ग्रुप के देवू पांगती के साथ मिलकर कुमाऊंनी रामलीला की रिकॉर्डिंग में जुटे थे। यह काम भी बीच में रुक गया है।
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खुद भटकता रहे, दूसरों के लिए खोला स्टूडियो
पप्पूदा ने एक बार बताया कि शुरुआत के दिनों में वह स्टेज पर प्रस्तुति देने लगे थे। कई म्यूजिक कंपनी वाले उनकी गायकी को सराहते, लेकिन जब उनके स्टूडियो गए तो टहलाया जाता था। एक साल पहले दवुवाढूंगा में पीके इंटरप्राइजेज नाम से रिकॉर्डिंग स्टूडियो खोला। कई प्रशिक्षु गायकों ने खुद को यहां तरासा।
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कुछ चर्चित लोकगीतऐ जा रे चैत बैशाख मेरो मुनस्यारा
बिर्थी कोला पानी बग्यो सारारा..
डीडीहाट की झमना छोरी
मधुली.. रूपै की रसिया
पहाणो ठंडो पांणी
तेरी रंगीली पिछौड़ी
छम छम बाजलि हो

Saturday, 2 June 2018

ऐसी शिव भक्ति पहले नहीं देखी होगी. मानसरोवर यात्रा पर तैयार की साढ़े तीन घंटे की डॉक्यूमेंट्री

ऐसी शिव भक्ति पहले नहीं देखी होगी. कैलास मानसरोवर यात्रा पर साढ़े तीन घंटे की डॉक्यूमेंट्री तैयार की. भक्तों को मुफ्त बांटते हैं डीवीडी.. हैदराबाद निवासी और मुंबई में रह रहे रामदास बोयापल्ली से
गणेश पांडे की बातचीत पर आधारित विशेष खबर..



रामदास बोयापल्ली
देवाधिदेव महादेव के आपने अनगिनत भक्त देखे होंगे। एक भक्त ऐसे भी हैं, जिन्होंने पूरे कैलास मानसरोवर यात्रा की डाक्यूमेट्री तैयार की है। इतना ही नहीं, डाक्यूमेंट्री की डीवीडी बनाकर शिव भक्तों को मुफ्त बांट रहे हैं। यह वीडियो कैलास मानसरोवर जाने वालों को गाइड भी कर रही है।
हैदराबाद निवासी 45 वर्षीय रामदास बोयापल्ली मुंबई में इलेक्ट्रानिक्स सामान का व्यापार करते हैं। बोयापल्ली ने उत्तराखंड के हल्द्वानी, धारचूला से लिपुलेख दर्रा होते हुए लगातार तीन बार कैलास मानसरोवर की यात्रा की। 2014 में पहली बार यात्रा पर गए थे। बोयापल्ली ने दिल्ली से कैलास पर्वत के दर्शन, मानसरोवर की परिक्रमा से लेकर वापस दिल्ली तक की पूरी यात्रा की वीडियोग्राफी की है। साढ़े तीन घंटे की वीडियो फिल्म में बस के सफर के साथ धारचूला, कालामुनी, गुंजी, तकलाकोट के दुर्गम रास्ते, प्राकृतिक सौंदर्य के साथ पल-पल बदलते मौसम को कवर किया है। बैकग्राउंड साउंड के तौर पर शिव स्त्रोत, शिव पंचाक्षर, रुद्राष्टक स्त्रोत, शिव तांडव स्त्रोत आदि प्रयोग किया गया है।


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हाई क्वालिटी कैमरा का प्रयोग
वीडियो कैमरा को लेकर आरडी बोयापल्ली को बड़ा जुनून रहा है। उनके पास विश्व की एडवांस तकनीक के 360 डिग्री में वीडियो शूट करने वाले वाटर प्रूफ, हाईरोल, थ्रीडी तकनीक कैमरा हैं। जो बड़े प्रोडेक्टशन हाउस में काम आते हैं। बोयापल्ली चार कैमरा को सिर, थ्रीडी चश्मा, हैंड कैमरा के रूप में एक साथ चलाते हैं। उच्च तकनीक के चलते वीडियो में संबंधित स्थान का तापमान, ट्रेक का स्थान, समुद्र सतह से ऊंचाई के साथ व्यक्ति की दिल की धड़कन भी पता चलती रहती है।

मानसरोवर यात्रा के दौरान बोयापल्ली का क्लिक फोटो

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कैलास यात्रियों को कर रही गाइड
मोबाइल पर हुई बातचीत में आरडी बोयापल्ली ने बताया कि अब तक 200 से अधिक डीवीडी तैयार कर बांट चुके हैं। इसमें सबसे अधिक वो लोग हैं जो 2015 और 2016 में बैच में उनके साथ यात्रा कर चुके हैं। फेसबुक, यूट्यूब पर वीडियो यात्रियों को गाइड करने के काम आ रही है।

रामदास बोयापल्ली

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सोशल मीडिया पर किया अपलोड
वर्ष 2016 की 22 दिन की यात्रा की वीडियो को एडिटिंग करने में छह माह का समय लगा। बोयापल्ली ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन में वीडियो को पांच से सात मिनट का काटकर अपलोड किया है। कानपुर निवासी कैलाशी बीना भाटिया के बनाए फेसबुक ग्रुप कैलास मानसरोवर यात्रा लिपुलेख जत्था 2 में वीडियो शेयर की गई हैं। यूट्यूब पर रामदास बोयापल्ली सर्च कर वीडियो देखी जा सकती हैं।