पहाड़ के जीवन-दर्शन, लोक संस्कृति और सामाजिकता को एक-दूसरे के साथ बांटने का प्रयास
चम्पावत जिले के देवीधुरा में होने वाले पौराणिक व एतिहासिक महत्व के बग्वाल मेले (पाषाण युद्ध) में प्रयोग होने वाली ढाल राष्ट्रीय धरोहर का हिस्सा बन गई है। देवीधुरा के प्रसिद्ध मां बाराही मंदिर में रक्षाबंधन के दिन होने वाले बग्वाल मेले में चार गांवों (स्थानीय भाषा में चार खाम) के लोग दो समूह में बंटकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। पत्थरों की बारिश से चोटिल होने से बचाने वाली ढाल (फर्रे) को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल में प्रदर्शित किया गया है। बाराही मंदिर में श्रावण शुक्ल एकादशी से कृष्ण जन्माष्टमी तक मेला आयोजित होता है। रक्षाबंधन यानी श्रावणी पूर्णिमा के दिन होने वाली 'बग्वाल' एक तरह का पाषाण युद्ध है। जिसको देखने देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी मेले को लेकर चली आ रही मान्यता बताते हुए कहते हैं कि बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती। 
No comments:
Post a Comment